लखनऊ विश्वविद्यालय में देवर्षि नारद जयंती समारोह का आयोजन किया गया

लखनऊ : 23 मई (त्रिवेणी न्यूज़)


देवर्षि नारद जयंती के पावन अवसर पर आज लखनऊ विश्वविद्यालय और विश्व संवाद केन्द्र के संयुक्त तत्वाधान में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन एपी सेन सभागार में किया गया। संगोष्ठी कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों को पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया गया। देवर्षि नारद जयंती के पावन अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग और विश्व संवाद केन्द्र के संयुक्त तत्वाधान में लखनऊ विश्वविद्यालय के एपी सेन सभागार में राष्ट्रीय संगोष्ठी का देवर्षि नारद जी की वेदसम्मत नीतियां और वर्तमान भारतीय पत्रकारिता विषय पर आयोजन हुआ।

राष्ट्रीय संगोष्ठी  को आरंभ करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक  के प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. अशोक दुबे ने कहा कि देवर्षि नारद जी को संचार के विविध सोपानो के माध्यम से हम जानते हैं। देवर्षि नारद ने हमेशा लोकमंगल की पत्रकारिता की। डॉ. दुबे ने बताया की पत्रकारिता शब्द भारत का नहीं है बल्कि भारत में तो भौतिक समृद्धि के साथ साथ आध्यात्मिकता अधिष्ठान पर भी बल दिया गया है। हमारे यहां सामाजिक कार्यों में कार्य करते हुए विशेष पूजन होता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में देवर्षि नारद हमारी संस्कृति में पूजनीय है। हजारों वर्षों के इतिहास काल में हमारे यहां विभिन्न संघर्षों के साथ अपने विचारो पर अडिग रहे। पत्रकारिता जगत में समाचार का विशेष योगदान है।

राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख और मुख्य वक्ता सुभाष जी ने  कहा कि देवर्षि नारद भगवान के मन है, विद्वान है और संचारक है। पत्रकारिता का मूल तत्व जिज्ञासा है। जिज्ञासा होगी तो जानकारी प्राप्त हो सकती है। सुभाष ने कहा कि किसी भी प्राणिपाति व्यक्ति को स्वयं को जानना है। नारद संवाद शैली में पारंगत होने के साथ साथ समाज कल्याण के लिए आदर्श है।  पत्रकारिता के माध्यम से जनकल्याण की सूचनाओं को सामने लाना ही आदर्श पत्रकारिता है। सत्य की आराधना करने से जन कल्याण संभव हैं।  भारत में कहा भी जाता है कि सत्यमेव जयते।  भारत के पत्रकारों ने सत्याग्रही बनकर अपनी लेखनी से समाज को जागने का काम किया जिससे भारत के सफल लोकतंत्र की स्थापना हुई। सुभाष ने कहा कि  चिंतन व्यवहारिक होना चाहिए। देवर्षि नारद का शील ही संदेश है। नारद केवल संचारक ही नहीं उद्धारक भी है। नारद जी का जीवन लोक कल्याण के लिए है। बहुजन समाज के लिए है। नारद जी चरवैति- चरवैति के द्योतक हैं। सुंदरता के साथ दिव्यता होनी चाहिए जिसके बाद ही पूर्णता संभव है। हमें पत्रकारिता की पूर्णता तक जाना चाहिए। समन्वय का आधार ही संगीत है। कहा भी गया है मिले स्वर मेरा तुम्हारा तो स्वर बने हमारा। यह सभी समन्वय का रूप है। पत्रकारिता एक दीपक के समान है जिसका कार्य अन्तत चलते रहना है।

संगोष्ठी  को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने कहा कि आज की पत्रकारिता में द्वंद है। पहले की पत्रकारिता मिशन थी जबकि आज की पत्रकारिता अधर में ही लटकी हुई है। देवर्षि नारद की संचार शैली आज की संचार शैली से अलग है। आज की पत्रकारिता में समन्वय और संतुलन बनाए रखना है। आज लगभग नकारात्मक खबरें ही लीड खबर बनती है। दुनिया में भी लीड खबर की मूल अवधारणा में नकारात्मकता है। भारत के मीडिया को इस नैरेटिव से बाहर आने की आवश्यकता है। मानव सभ्यता का विकास विविधता में होता है। हमें देवर्षि नारद के सत्यान्वेषण की ओर ले जाना चाहिए। संगोष्ठी के अन्तिम सत्र में लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष नरेंद्र भदौरिया ने कहा कि भारत के दर्शन और संस्कृति को पाश्चात्य देशों द्वारा हमेशा नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया। हमें अपनी संस्कृति पर संशय नहीं करना है। आज की पत्रकारिता ने सोशल मीडिया के सामने घुटने टेक दिए हैं। भदौरिया ने कहा की भारत का विज्ञान सबसे उत्तम है। हमें पाश्चत्य मीडिया के सामने नहीं झुकना है। हमें साहस से दिशा मोड़नी है। राष्ट्रीय संगोष्ठी के इस कार्यक्रम का आभार अशोक सिन्हा ने किया। राष्ट्रीय संगोष्ठी कार्यक्रम का संचालन डॉ. सौरभ मालवीय ने किया।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अवध के सह प्रचार प्रमुख डॉ. शचीन्द्रनाथ , डॉ लोकनाथ, प्रांत सह संपर्क प्रमुख डॉक्टर हरनाम सिंह, प्रांत धर्म जागरण प्रमुख सुरेंद्र, भाषा विश्वविद्यालय के उपकुलानुशाक डॉ.मनीष कुमार, वरिष्ठ पत्रकार भारत सिंह, बृजनंदन राजू, डॉ. संतोष आदि विभिन्न संस्थाओं के पत्रकार और विभिन्न संस्थाओं के पत्रकारिता के विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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