भारत में शिक्षा को अध्यात्म केंद्रित बनाना होगा  – डॉ कृष्ण गोपाल

लखनऊ : 16 फरवरी (त्रिवेणी न्यूज़)

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉक्टर कृष्ण गोपाल

लखनऊ विश्विद्यालय में चल रहे तीन दिवसीय अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम 2024 के दूसरे दिन के अंतिम सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने उपस्थित विद्वत्जनों को सम्बोधित किया । इस सत्र की अध्यक्षता मुख्यमंत्री के शिक्षा सलाहकार प्रो.डी.पी.सिंह ने कियां । सभागार में उपस्थित विशिष्ट जनों में प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार राय, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर कैलाश चंद्र शर्मा ,विद्या भारती के ही महासचिव  प्रोफेसर नरेंद्र कुमार तनेजा और सचिव डॉक्टर आशीष पुराणिक आदि के नाम उल्लेखनीय है।  ख्याति प्राप्त वरिष्ठ शिक्षा विद डॉक्टर के सी शर्मा, नोएडा से पधारे डॉ आर के गुप्ता ,सहारनपुर से डॉक्टर शोभा त्रिपाठी,  साकेत महाविद्यालय अयोध्या से प्रोफेसर योगेंद्र प्रसाद त्रिपाठी , लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से प्रोफेसर योगेंद्र सिंह, प्रोफेसर अलका पांडे, प्रो. पवन अग्रवाल, नेशनल पीजी कॉलेज के प्रोफेसर रामकृष्ण, खुनखुन जी की गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्रिंसिपल प्रोफेसर अंशु केडिया आदि भी इस महत्वपूर्ण व्याख्यान के दौरान उपस्थित थे।

अपनी संबोधन में डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने कहा कि आज दुनिया भारत को देखना सुनना और समझना चाहती है । भारत की ज्ञान परंपरा पर केंद्रित विविधताओं से भरे जीवन दर्शन पर शोध, विमर्श और चर्चा करने के लिए विश्व के अनेक देश लगे हैं। हमारे यहां शिक्षा व्यवस्था इतनी समृद्ध रही है कि काल गणना, ज्योतिष ज्ञान, नक्षत्र की गति आदि विधाओं के ज्ञान की बात हमारे ऋषियों, मनीषियों , विद्वानों, आचार्यों द्वारा हजारों वर्ष से की जाती रही है । गीता में. रामायण में, उपनिषद में, भारतीय ज्ञान परंपरा विद्यमान है । भारत में ज्ञान का केंद्र तक्षशिला , नालंदा, काशी आदि हजारों वर्षों से विद्यार्थियों को शिक्षित और संस्कारित करने का कार्य करते रहे । यह बात भी सच है कि ग्रीक आक्रमण के बाद से हमारे देश में संघर्ष का दौर् रहा । फिर भी भारतीय समाज अपने मूल्यों के साथ बना हुआ है । परिवर्तन के दौर में हम बहुत तेज गति से विश्व के सामने बढ़ रहे हैं । स्वतंत्रता के समय भारत संघर्ष करते-करते कमजोर हो गया था। उसी कमजोरी के कारण विश्व के देश भारत पर हंसते थे और कहते थे कि यह देश समाप्त हो जाएगा ।यह देश नष्ट हो जाएगा। लेकिन उन सब को झूठा साबित करते हुए यह देश अभी भी मजबूती से खड़ा है क्योंकि भारत का चिंतन आध्यात्मिक है।

डॉ कृष्ण गोपाल ने अपने उद्बोधन में आगे कहा कि आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि भारत में आखिर कौन सी ताकत है, कौन सी शक्ति है ,कौन सा बल है ,जो भारत को भारत बना के रखता है । इसका उत्तर है हमारी आध्यात्मिक शक्ति। भारत की आध्यात्मिक शक्ति में संगीत है और संगीत का स्वर है ।
भारत का जीवन दर्शन और जीवन पद्धति प्रकृति पर आधारित है। प्रकृति का उपासक भारतीय समाज प्रकृति की सेवा करता है जबकि पश्चिम का चिंतन प्रकृति का उपभोग करता है। यही अंतर नेशन और राष्ट्र में है। नेशन वर्चस्व की बात करता है नेशन संघर्ष और अस्तित्व के लिए लड़ता है जबकि राष्ट्र त्याग की भावना है सेवा की भावना है,। राष्ट्र में प्रकृति और व्यक्ति दोनों एक दूसरे के उपासक है। पेड़ धूप में बारिश में भी खड़ा रहकर दूसरे को छाव देता है ।नदी बहती है। दूसरे को जल देती है ।भारत का चिंतन व्यक्ति से ऊपर होकर मनुष्यता की तरफ ले जाता है। यह हमारा है यह तुम्हारा है इस चिंतन से मुक्त भारतीय समाज सर्व स्पर्शी है जो संपूर्ण मानवता की सेवा के लिए है।
व्यष्टि  से समष्टि-  यही भारतीय दर्शन है। यही भारतीय अध्यात्म है । पश्चिम ने शिक्षा तो दी लेकिन संस्कार नहीं दिया ।वहां जो कमाता है वही खाता है। वही मालिक है । भारत में , भारतीय शिक्षा पद्धति में ,त्याग सबसे बड़ा धर्म माना गया है ।हम दूसरे की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं । शिक्षा द्वारा संस्कार का निर्माण होता है ।यही भारतीय ज्ञान परंपरा है। सुचिता नैतिकता और संस्कार से हम पूरे समाज को एक सूत्र में बांध के रखे हैं। आज आवश्यकता है भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मूल्य आधारित शिक्षा की ।समाज आधारित शिक्षा की ।भारत बोध आधारित शिक्षा की जो भारतीय परंपराओं को और भारतीय मूल्यों को भारतीय के युवा पीढ़ी से परिचित कराए और पीढ़ियां समाज और राष्ट्र के प्रति श्रद्धा भाव रखें तभी यह भारत पुनः अपने गौरवशाली शिक्षा व्यवस्था को समृद्ध कर सकेगा ।

और भारतीय चिंतन दर्शन प्रकृति की पूजा करना है यही अंतर नेशन और राष्ट्र में है नेशन वर्चस्व की बात करता है नेशन संघर्ष और अस्तित्व के लिए लड़ता है जबकि राष्ट्र त्याग की भावना है सेवा की भावना है, राष्ट्र में प्रकृति और व्यक्ति दोनों एक दूसरे के उपासक है। पेड़ धूप में बारिश में भी खड़ा रहकर दूसरे को छाव देता है नदी बहती है दूसरे को जल देती है भारत का चिंतन व्यक्ति से ऊपर होकर मनुष्यता की तरफ ले जाता है यह हमारा है यह तुम्हारा है इस चिंतन से मुक्त भारतीय समाज है सर्व स्पर्शी है जो संपूर्ण मानवता की सेवा के लिए है।
व्यष्टी से समष्टि यही भारतीय दर्शन है यही भारतीय अध्यात्म है । पश्चिम ने शिक्षा तो दी लेकिन संस्कार नहीं दिया वहां जो कमाता है वही खाता है वही मालिक है और भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति में त्याग सबसे बड़ा धर्म माना है हम दूसरे की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं । शिक्षा द्वारा संस्कार का निर्माण होता है यही भारतीय ज्ञान परंपरा है। सुचिता नैतिकता और संस्कार से हम पूरे समाज को एक सूत्र में बांध के रखे हैं आज आवश्यकता है भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मूल्य आधारित शिक्षा की समाज आधारित शिक्षा की भारत बोध आधारित शिक्षा जो भारतीय परंपराओं को भारतीय मूल्यों को भारत की युवा पीढ़ी से परिचित कराए ।आने वाली पीढ़ियां समाज और राष्ट्र के प्रति श्रद्धा भाव रखें तभी यह भारत पुनः अपनी गौरवशाली शिक्षा व्यवस्था को समृद्ध कर सकेगा ।

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