मधु दीक्षित के गीत संग्रह की समीक्षा

लखनऊ.: 17 फरवरी (त्रिवेणी न्यूज़)

चर्चित कवयित्री मधु दीक्षित के नव प्रकाशित कविता संग्रह की समीक्षा प्राप्त हुई है ।उसे यथावत प्रकाशित किया जा रहा है।

मधु दीक्षित के गीत संग्रह की समीक्षा
*समीक्षक केवल प्रसाद सत्यम

कृति का नाम: श्वास करे जब तक नर्तन (गीत संग्रह)
कृतिकार: मधु दीक्षित
प्रकाशक: नीतू आनंद पबलिकेशंस, लखनऊ।
प्रकाशन वर्ष: 2023 प्रथम संस्करण
पुस्तक का मूल्य: ₹ 250.00 (हार्ड बाउन्ड) पृष्ठ–164
चलभास : 94506 07902


वरिष्ठ कवयित्री मधु दीक्षित ने अपने जीवन को हिन्दी साहित्य के प्रचार–प्रसार एवं समाजिक उत्थान के कार्यों में समर्पित कर रखा है, जो प्रणम्य है। आपने साक्षरता निकेतन विभाग में रहकर जो कुछ सीखा उसे अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को सौंपने का दृढ़ निश्चय करके बड़ी तत्परता से हिंदी साहित्यिक सेवा में संलग्न हैं। मुझे आपको विभिन्न काव्य गोष्ठियों एवं साहित्यिक समारोह में सुनने का अवसर प्राप्त हुआ जो सदैव प्रभावित करते रहे हैं। यद्यपि कि आप अपने दीर्घ कालीन रचना संसार को आवश्यकतानुसार निरंतरता नहीं दे पायीं फिर भी देर से ही सही आपकी सच्ची साहित्य संलग्नता में यह प्रथम गीत संग्रह ”श्वास करे जब तक नर्तन’ पाठकों को आकर्षित और अधिक प्रभावित कर रही है।
“जीवन ज्योति जला करती है,
श्वास करे जब तक नर्तन।
जीवन और मृत्यु का नाता,
चलता रहता सदा सघन।।
साथ जन्म के शीश उठाते
इच्छाओं के भी तूफान।
दुर्गम पथ को पार करे वह
जो लेता है मन में ठान।।
छू पाता है वही गगन।”
आपके सदज्ञान, सद्भावना, संवेदना, भक्ति, आत्मदर्शन में अध्यात्म और परमार्थ का सूत्र एक आदर्श समाज के निर्माण में सहायक है जो भारतीय संस्कृति तथा विराट जीवन के दर्शन को स्थापित करने में सफल हैं। इनके मन की विकलता में प्राणियों के प्रति नि:स्वार्थ चिंतन स्पष्ट दिखाई देता है–
”सत्य हुआ है मौन अकिंचन,
और प्रखर है आज प्रवंचन।
कुटिल कलुष को हर ले,
जननी सत्य मुखर स्वर दे।
वर दे वीणा वादिनी वर दे।”
आप सरस कंठ की धनी हैं। गीतों में बरबस ही स्वर, लय, ताल और छंद प्रवीणता से प्रवेश कर जाते हैं। ऐसा नहीं है कि आपको पिंगल शास्त्र के छंद विज्ञान का ज्ञान नहीं है। आप लगातार विभिन्न छंदों– दोहा, कुंडलिया, गीतिका, ग़ज़ल आदि में रचनाएं करती रहती हैं। इनका एक गीत अवलोकित करें जिसमें रूपमाला छंद का आधार लिया गया है–
”ईश की अनमोल कृति हूं मैं सुकोमल नार।
राधिका सीता सती मैं प्रीति हूं साकार।।
हूं दया ममता भरी अति
प्रीती का उल्लास।
साधना भी कामना भी
तृप्ति मैं ही प्यास।।
सप्तरंगी जिंदगी का
सावनी शृंगार,
प्रीति हूं साकार।
आपके गीतों में भक्ति, ज्ञान, समर्पण और संवेदना के साथ ही साथ हास परिहास को भी बड़ी सरलता और कोमलता से ढाला गया है, जो सीधे सीधे पाठक के मन में उतर जाती है–
हाथ पकड़ खुशियों के दाने,
आओ हँस लें किसी बहाने।
जीवन की ये राम कहानी,
पूरी कौन जान पाया है।
मुझको तो सच्ची लगती है, जिसको लोग समझते माया
माया कहने वाले अक्सर,
चाबी रख सोते सिरहाने,
आओ हँस लें किसी बहाने।।
गीतों में यदि गाँव की बात न हो तो मानवता की बात अधूरी रह जाती है। आपने बहुत ही शिद्दत से गांवों की जिंदगी को अनुभूत करके उसे वर्तमान के विकासशील सांचे में ढाल कर वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत किया है जो बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है–
”बड़े शौक से गांव गए पर, अच्छा नहीं लगा।
आवभगत तो हुई बहुत पर सच्चा नहीं लगा।।
जीवन में बच्चों जैसी चंचलता, लक्ष्य प्राप्त कर लेने की जिद और समाज में आदर्श स्थापित करने की चाह में देवताओं को उलाहना देकर उन्हें भी जीवन के सतपथ पर चलने का आग्रह करने का साहस अद्भुत और अपनत्व से ओतप्रोत है। इसके बावजूद आप समाज में जैसा देखती हैं उसके अनुरूप ही चलने में तनिक भी संकोच नहीं करती हैं। ऐसा बहुत देर तक नहीं रहता है बल्कि स्व पीड़ा में जन मानस के दर्द को महसूस करके पुन: अपने परमार्थ के पथ पर वापस लौटकर गीत गाते हुए मिल जाती हैं–
प्रेम के पंथ पर बढ़ चले जो कदम,
छा उजाला गया दूर है आज तम।
मंत्र जैसे मिला, जिंदगी का सरल,
प्रेम से ही मिटे नफरतों का गरल।।
”बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” के साथ ही साथ महिलाओं के सशक्तिकरण में स्वत्व की पहचान कराने को भी आप जागरूक हैं। आपका मानना है कि स्त्री पुरुष दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर और पूरक हैं। किसी एक की अवहेलना करके दूसरे का उत्थान नहीं किया जा सकता है।
”आस तो देते नहीं तुम विश्वास लेकर क्या करूं।
अधिकार तो देते नहीं उपहार लेकर क्या करूं।।
आपके भावों में मीरा, राधा, और महादेवी वर्मा की आत्मा बसती है तो दूसरी ओर सुभद्रा चौहान की झांसी की रानी की उपस्थिति भी हमें दिखाई देती है।
”बाधाओं को मान चुनौती,
हमने कदम बढ़ाया है।
कभी न हिम्मत हारी है जब
तूफां आ टकराया है।।
या
अपने बल की ज्योति जला दो,
कर दी जग उजियारा।
जागो नारी आज समय ने ,
फिर से तुम्हें पुकारा। ।
प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति आपका गंभीर चिंतन आपके गीतों में झलकता है–
”शीत वर्षा ताप सबकी आंख में आक्रोश सा है।
और मौसम के हृदय में आ गया कुछ दोष सा है।।
सह रही चुपचाप यह बर्ताव
धरती क्या करे अब?” या
शील शिष्टाचार कुछ तो चाहिए,
जगत में व्यवहार कुछ तो चाहिए।
आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम को जीवन के अनिवार्य तत्व रूप में देखने वाली गीतकार गा उठती हैं–
”अपनी हिम्मत अपने श्रम का,
हमको सदा सहारा है।
श्रम ही तो है अपनी पूजा,
श्रम ही धर्म हमारा है।।
साथ ही आशा और विश्वास को भी नहीं त्यागतीं हैं–
बीत गया वनवास,
राम घर वापस आते हैं।
लगा लगा कर जयकारे,
सब मंगल गाते हैं ।।
तभी वर्तमान के परिवेश में विद्वेषों और विसंगतियों से विचलित मानव के जीवन द्वंद्व से व्यथित होकर आप अपनी आत्मा को सांत्वना देती हैं–
”आशाओं के दीप जलाकर,
हमने कितना धोखा खाया।”
घर में ही रहकर भोगा है ,
हमने तो वनवास।
एक नहीं थीं कई मंथरा,
भरे जिन्होंने कान।
और सफल हो गई कराने,
अपनों को विषपान।।
यह गीत संग्रह आशा–निराशा, आत्म विश्वास और कठिन परिश्रम में दृढ़ता और साहस के बीजों का रोपण करता हुआ एक सुंदर, पठनीय, संप्रेषणीय और संग्रहणीय अभिलेख है। इसकी भाषा बोलचाल की सरल, सरस और बोधगम्य है। गीतों में रस, छंद और अलंकार विषयानुरूप स्वाभाविक रूप से आए हैं। कलापक्ष के अनुरूप शब्द संयोजन उच्च कोटि के हैं। अभिधा की प्रखरता में कथ्य की व्यंजना और लक्षणा पर प्रभाव पड़ा है। यद्यपि की गीतों की सरसता, कोमलता और लयात्मकता में तत्सम शब्दों का प्रयोग छंदों तथा बोधगम्य भाषा के अनुरूप अति सहायक ही सिद्ध हुए हैं।
आज के सामाजिक परिदृश्य की परिकल्पना में आपने जो गीत प्रस्तुत किए हैं, वे सुंदर और श्रेष्ठ हैं। वास्तव में ऐसे सुगढ़ शब्द विन्यास और छंद विधान में बहुत ही कम रचनाएं/संग्रह देखने और पढ़ने को मिलती हैं। आपने अधिकतर गीत के लक्षण/विधान को संक्षिप्त परिचय के साथ उल्लेखित किया है। यह गीत संग्रह मानव जीवन में सत्य मार्ग पर आरूढ़ होकर सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। हिन्दी गीतों में भावों और वैचारिकता की अनिवार्यता एवं संवेदना प्रमुख होती है, जिसमें आप पूर्णतया सफल हैं। जिसका साहित्य समाज में खुले हृदय से स्वागत किया जाएगा। ऐसा मेरा विश्वास भी है।
इस संग्रह के गीतकार ने आज की जाति–पाति, भक्ति भाव, द्वेष–विद्वेषों आदि विसंगतियों के विरुद्ध समानता और सद्भाव से विश्वबंधुत्व की भावना को बड़े सहज–सरल–सरस रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है जो अतिशय सफल और मनन करने योग्य तो है ही साथ ही साथ समाज में एक आदर्श, दर्शन और सदसंस्कृति की स्थापना करने में भी सहायक है।

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