
छत्तीसगढ़ मीडिया टीम के साथ अंडमान-निकोबार की आठ दिवसीय अविस्मरणीय यात्रा…
जितेंद्र नाथ मिश्रा
अंडमान-निकोबार का नाम आते ही मन में सबसे पहले एक अलग ही तस्वीर उभरती है—चारों ओर अथाह समुद्र, दूर-दूर तक फैले छोटे-बड़े द्वीप, घने जंगल, सेल्युलर जेल की कालकोठरियां और स्वतंत्रता संग्राम के उन वीरों की याद, जिन्हें कभी अंग्रेजों ने ‘कालापानी’ की सजा देकर मुख्यभूमि भारत से हजारों किलोमीटर दूर भेज दिया था।
बचपन से अंडमान-निकोबार के बारे में बहुत कुछ सुनता और पढ़ता आया था। लेकिन उसे अपनी आंखों से देखने, वहां के लोगों को समझने और विकास की नई तस्वीर को करीब से महसूस करने का अवसर पहली बार फरवरी 2026 में मिला।
इस बार संयोग कुछ ऐसा बना कि भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के एक दल को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के आठ दिवसीय अध्ययन एवं मीडिया भ्रमण पर ले जाने का निर्णय लिया। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लगभग एक दर्जन पत्रकारों का चयन हुआ और राजनांदगांव से मुझे भी इस दल में शामिल होने का अवसर मिला।
यह केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं थी। यह यात्रा उस भारत को देखने की थी, जो समुद्र के बीच बसे दूरस्थ द्वीपों तक विकास, डिजिटल कनेक्टिविटी, वैज्ञानिक अनुसंधान, राष्ट्रीय सुरक्षा और आधुनिक बुनियादी ढांचे को पहुंचाने में जुटा हुआ है।
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8 फरवरी : राजनांदगांव से शुरू हुआ सफर
8 फरवरी की शाम मेरे लिए विशेष थी। राजनांदगांव से मेरी यात्रा शुरू हुई और आगे रायपुर एयरपोर्ट पहुंचने पर छत्तीसगढ़ के अन्य वरिष्ठ पत्रकारों से मुलाकात हुई। सभी के मन में एक जैसी उत्सुकता थी—पहली बार अंडमान-निकोबार को नजदीक से देखने का अवसर।
रायपुर से रात करीब 9.15 बजे हमारी उड़ान हैदराबाद के लिए थी। पत्रकारों के दल के साथ अधिकारियों की टीम भी थी। विमान ने रायपुर की धरती छोड़ी और कुछ ही घंटों बाद हम हैदराबाद पहुंच गए।
रात्रि विश्राम हैदराबाद में किया गया। अगले दिन सुबह अंडमान के लिए उड़ान पकड़नी थी। रात भर यात्रा की थकान थी, लेकिन उससे कहीं अधिक उत्साह उस अनजाने द्वीपसमूह तक पहुंचने का था, जिसके बारे में अब तक केवल किताबों, समाचारों और तस्वीरों में देखा था।
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9 फरवरी : पहली बार अंडमान की धरती पर
अगली सुबह पत्रकारों का दल फिर एयरपोर्ट पहुंचा। सुरक्षा जांच और औपचारिकताओं के बाद हम पोर्ट ब्लेयर के लिए रवाना हुए। कुछ घंटों की हवाई यात्रा के बाद पहली बार समुद्र के बीच फैले अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की धरती दिखाई दी।
ऊपर से दिखाई देता अथाह नीला समुद्र और उसके बीच हरे-भरे द्वीप वास्तव में अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे।
हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों ने पत्रकार दल का स्वागत किया। लेकिन यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि यहां पहुंचने के बाद विश्राम के लिए होटल जाना पहला कार्यक्रम नहीं था।
यहीं से अंडमान-निकोबार को समझने की हमारी वास्तविक यात्रा शुरू हो गई।
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पहला पड़ाव : सुनामी के बाद की तैयारी और एनडीआरएफ का संसार
हमारा पहला महत्वपूर्ण दौरा राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ से जुड़ा था। वर्ष 2004 की विनाशकारी सुनामी ने अंडमान-निकोबार सहित हिंद महासागर के कई क्षेत्रों को गहरे रूप से प्रभावित किया था।
उस त्रासदी के बाद यहां आपदा प्रबंधन को नए स्तर पर मजबूत किया गया।
एनडीआरएफ के अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया कि अंडमान-निकोबार सहित दक्षिण भारत के विस्तृत क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी एनडीआरएफ की चौथी बटालियन के कार्यक्षेत्र से जुड़ी है। इस बटालियन का मुख्यालय तमिलनाडु के अरक्कोणम में है।
हमारी मुलाकात एनडीआरएफ के सहायक कमांडेंट श्रीधर आर. से हुई। पत्रकारों के लिए यह जानना विशेष रूप से रोचक था कि उनका छत्तीसगढ़ से भी जुड़ाव रहा है और वे सुकमा क्षेत्र में काम कर चुके हैं। उन्होंने पत्रकारों से आत्मीयता के साथ बातचीत की और बताया कि द्वीपसमूह जैसे भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में आपदा से निपटना किस प्रकार अलग और कठिन है।
836 द्वीपों की चुनौती
यहां हमें जानकारी मिली कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में लगभग 836 द्वीप हैं। यह आंकड़ा सुनते ही इस विशाल द्वीपीय क्षेत्र को देखने की उत्सुकता और बढ़ गई।
चारों तरफ समुद्र और अलग-अलग दूरी पर बसे द्वीपों तक किसी आपदा के दौरान तत्काल पहुंचना आसान नहीं है। यही कारण है कि यहां राहत और बचाव के साथ-साथ पहले से तैयारी और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करने पर विशेष जोर दिया जाता है।
सुनामी, भूकंप और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए लोगों को लगातार जागरूक किया जा रहा है। द्वीपसमूह में लगभग 35 स्थानों पर सायरन आधारित चेतावनी व्यवस्था विकसित की गई है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में लोगों को समय रहते सतर्क किया जा सके।
सुनामी के बाद आवास निर्माण की व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। सुरक्षित संरचनाओं और निकासी मार्गों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
एनडीआरएफ परिसर में जवानों और अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान यह स्पष्ट रूप से महसूस हुआ कि आपदा प्रबंधन केवल घटना होने के बाद राहत पहुंचाने का नाम नहीं है। असली तैयारी पहले से की जाती है—प्रशिक्षण, चेतावनी व्यवस्था, सुरक्षित स्थान और लोगों की जागरूकता के माध्यम से।
एनडीआरएफ कैंप में पत्रकारों का आत्मीय स्वागत किया गया। चाय-नाश्ते के साथ स्थानीय व्यवस्था की गर्मजोशी ने यात्रा की शुरुआत को और यादगार बना दिया।
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अंडमान की सड़कों पर पहला अनुभव
एनडीआरएफ के बाद हम अपने अगले कार्यक्रम के लिए रवाना हुए। यात्रा के दौरान अंडमान की सड़कें और प्राकृतिक दृश्य लगातार ध्यान आकर्षित कर रहे थे।
घने हरे जंगलों के बीच से गुजरती सड़कें, पहाड़ियां और समुद्र की नजदीकी इस क्षेत्र को मुख्यभूमि भारत से बिल्कुल अलग बनाती हैं।
एक बात विशेष रूप से महसूस हुई कि यहां की पहाड़ी सड़कों पर वाहन चलाना हर चालक के लिए आसान नहीं है। ऊंचाई और ढलान के साथ बने घुमावदार रास्तों पर स्थानीय चालक बेहद कुशलता से वाहन चलाते दिखाई दिए।
अंडमान की यात्रा के दौरान यह भी समझ में आने लगा था कि यह क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। कभी ‘कालापानी’ के नाम से पहचाना जाने वाला यह द्वीपसमूह अब आधुनिक भारत के विकास की नई कहानी लिख रहा है।
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दूसरा पड़ाव : वैज्ञानिक कृषि और एकीकृत खेती का मॉडल
हमारा अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का केंद्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान—सीआईएआरआई।
यहां पहुंचकर अंडमान की कृषि व्यवस्था को समझने का अवसर मिला। संस्थान के निदेशक डॉ. जय सुंदर ने पत्रकारों को विस्तार से बताया कि मुख्यभूमि भारत की तरह यहां की खेती नहीं हो सकती।
द्वीपों की अपनी अलग जलवायु है, मिट्टी की अलग प्रकृति है और भूमि संसाधन भी सीमित हैं। इसलिए यहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक समाधान विकसित किए जा रहे हैं।
एकीकृत कृषि प्रणाली का प्रयोग
संस्थान द्वारा विकसित एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल में—
– फसल उत्पादन,
– बागवानी,
– पशुपालन,
– मत्स्य पालन,
– जैविक पोषक तत्व प्रबंधन,
– जल संरक्षण
को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है।
उद्देश्य यह है कि सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन लिया जाए और किसान की आय के लिए केवल एक फसल पर निर्भरता न रहे।
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नारियल और सुपारी की धरती
अंडमान-निकोबार की कृषि को देखते हुए सबसे पहले नारियल के विशाल पेड़ ध्यान आकर्षित करते हैं। यहां नारियल उत्पादन का विशेष महत्व है।
इसके साथ ही सुपारी के लंबे और ऊंचे पेड़ भी इस द्वीपीय क्षेत्र की कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पेड़ों की ऊंचाई पर लगे सुपारी के फल अपने आप में आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
यहां की कृषि व्यवस्था मुख्यभूमि से अलग होने के बावजूद स्थानीय जरूरतों और बाजार की मांग के अनुसार विकसित की जा रही है।
सब्जियों के उत्पादन से लेकर नई कृषि तकनीकों तक वैज्ञानिक लगातार प्रयोग कर रहे हैं।
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पशुपालन की अपनी चुनौती
द्वीपीय क्षेत्रों में पशुपालन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक चारे की उपलब्धता है।
यहां पशुओं के लिए पर्याप्त हरे चारे की व्यवस्था आसान नहीं है। इसके बावजूद वैज्ञानिक स्थानीय संसाधनों के आधार पर पशु आहार, नस्ल सुधार और स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
यह अनुभव बताता है कि भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में कृषि की समस्याएं अलग हैं और समाधान भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ही तैयार करने पड़ते हैं।
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मछली यहां के जीवन का अहम हिस्सा
समुद्र से घिरे इस द्वीपसमूह में मछली केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कई स्थानों पर भोजन में सब्जियों के साथ मछली का उपयोग सामान्य बात है। स्थानीय बाजारों और लोगों के दैनिक जीवन में समुद्री संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है।
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नौसेना कमांड सेंटर : समुद्री सीमाओं की सुरक्षा से परिचय
यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के कमांड सेंटर का दौरा भी विशेष अनुभव रहा।
छत्तीसगढ़ से आए पत्रकारों को नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक क्षमता की जानकारी दी।
हमें आईएन एलसीयू एल-58 सहित नौसेना के महत्वपूर्ण जहाजों के बारे में बताया गया।
आईएन एलसीयू एल-58 स्वदेशी तकनीक से निर्मित लैंडिंग क्राफ्ट यूटिलिटी जहाज है, जिसका निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा किया गया है। यह टैंक, बख्तरबंद वाहन और सैनिकों के परिवहन में उपयोगी है।
यह जहाज समुद्री अभियान के साथ-साथ आपदा राहत और तटीय क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके अलावा पत्रकारों को आईएनएस कुलिश के बारे में भी जानकारी दी गई। नौसेना अधिकारियों ने बताया कि यह एक महत्वपूर्ण युद्धपोत है, जो आधुनिक हथियार और मिसाइल प्रणालियों से सुसज्जित है।
नौसेना के जवानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले विभिन्न हथियारों और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को करीब से समझना पत्रकार दल के लिए विशेष अनुभव था।
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सेल्युलर जेल : इतिहास की सबसे गहरी पीड़ा का साक्षात्कार
अंडमान की यात्रा से सेल्युलर जेल को अलग करके नहीं देखा जा सकता।
वह स्थान, जहां कभी स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजी शासन ने मुख्यभूमि भारत से दूर रखकर अमानवीय यातनाएं दीं, आज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी स्मृतियों में शामिल है।
सेल्युलर जेल में आयोजित लाइट एंड साउंड शो के दौरान इतिहास जैसे आंखों के सामने जीवंत हो उठा।
कालापानी की सजा, स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष और देश की आजादी के लिए दिया गया बलिदान—इन सबको देखकर मन भावुक हो गया।
यहां केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं दिखाई देती, बल्कि स्वतंत्र भारत की आजादी की कीमत का एहसास होता है।
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बारातांग की ओर : जंगल, समुद्र और प्रकृति का अनोखा रास्ता
यात्रा के अगले चरण में पत्रकार दल सुबह-सुबह उत्तर अंडमान की दिशा में रवाना हुआ।
बारातांग की यात्रा अपने आप में रोमांचक अनुभव है। घने उष्णकटिबंधीय जंगलों, समुद्री क्रीक्स और प्राकृतिक रास्तों से गुजरते हुए हम उस क्षेत्र तक पहुंचे, जहां प्रकृति ने हजारों वर्षों में अपनी अद्भुत कलाकृति तैयार की है।
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बारातांग की लाइमस्टोन गुफाएं : बूंद-बूंद से बनी प्रकृति की कला
बारातांग की चूना पत्थर की गुफाओं में प्रवेश करते ही एक अलग दुनिया दिखाई देती है।
हजारों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी इन गुफाओं में छत से लटकती स्टैलेक्टाइट संरचनाएं और जमीन से ऊपर उठती स्टैलेग्माइट संरचनाएं दिखाई देती हैं।
कुछ स्थानों पर ये दोनों मिलकर प्राकृतिक स्तंभों का रूप ले लेती हैं।
यह समझना बेहद रोचक था कि इन संरचनाओं को किसी मानव ने नहीं बनाया। पानी की बूंदों के साथ होने वाले खनिज निक्षेपण ने हजारों वर्षों में इन्हें आकार दिया है।
वन अधिकारियों ने बताया कि ये बेहद संवेदनशील प्राकृतिक संरचनाएं हैं। इन्हें छूना या नुकसान पहुंचाना इनके विकास को प्रभावित कर सकता है।
गुफाओं तक पहुंचने के लिए मैंग्रोव क्षेत्र और प्राकृतिक जलमार्गों से गुजरना भी अपने आप में यादगार अनुभव रहा।
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मड वॉल्केनो और प्रकृति की दूसरी दुनिया
बारातांग क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता केवल लाइमस्टोन गुफाओं तक सीमित नहीं है।
यहां मड वॉल्केनो यानी मिट्टी के ज्वालामुखी भी देखने को मिले। अंडमान की भू-वैज्ञानिक संरचना इसे भारत के सबसे विशिष्ट प्राकृतिक क्षेत्रों में शामिल करती है।
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समुद्र पर बना विकास का पुल : आज़ाद हिंद सेतु
उत्तर और मध्य अंडमान को जोड़ने वाला आज़ाद हिंद सेतु आधुनिक बुनियादी ढांचे की शानदार मिसाल है।
लगभग 1.45 किलोमीटर लंबे इस पुल ने फेरी आधारित यात्रा पर निर्भरता को काफी हद तक बदल दिया है।
पहले यात्रियों और वाहनों को फेरी का इंतजार करना पड़ता था। मौसम खराब होने पर यात्रा और कठिन हो जाती थी।
पुल बनने के बाद आवागमन अधिक तेज और व्यवस्थित हुआ है।
पत्रकार दल ने इस विशाल संरचना को नजदीक से देखा और समझा कि किसी दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्र में सड़क और पुल केवल यातायात का साधन नहीं होते, बल्कि वे—
– चिकित्सा सुविधा,
– शिक्षा,
– बाजार,
– ईंधन,
– पेयजल,
– प्रशासन
तक लोगों की पहुंच को भी बेहतर बनाते हैं।
समुद्र के ऊपर खड़ा यह पुल वास्तव में विकास की बदलती तस्वीर का प्रतीक दिखाई दिया।
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समुद्र के नीचे इंटरनेट : डिजिटल अंडमान की नई कहानी
यात्रा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी अनुभवों में से एक था समुद्र-तल ऑप्टिकल फाइबर केबल परियोजना को समझना।
पहले अंडमान-निकोबार की डिजिटल कनेक्टिविटी मुख्य रूप से उपग्रह आधारित थी। सीमित बैंडविड्थ और इंटरनेट की गति एक बड़ी चुनौती थी।
लेकिन चेन्नई से अंडमान तक समुद्र के नीचे ऑप्टिकल फाइबर केबल पहुंचने के बाद स्थिति बदल गई।
इस परियोजना ने—
– ऑनलाइन शिक्षा,
– टेली-मेडिसिन,
– ई-गवर्नेंस,
– पर्यटन,
– व्यापार
को नई गति दी है।
समुद्र की गहराइयों से होकर हजारों किलोमीटर तक बिछाई गई केबल आधुनिक भारत की उस तकनीकी क्षमता का उदाहरण है, जिसके बारे में आम लोग शायद बहुत कम जानते हैं।
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राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान : समुद्र में आजीविका की नई संभावनाएं
राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान—एनआईओटी में पत्रकार दल को समुद्री संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग की जानकारी दी गई।
प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी डॉ. दिलीप कुमार झा ने बताया कि भूमि संसाधनों की सीमाओं के बीच समुद्र आधारित आजीविका भविष्य की बड़ी संभावना बन सकती है।
खुले समुद्र में मछली पालन
ओपन सी केज कल्चर के माध्यम से समुद्र में विशेष पिंजरों में मछली पालन किया जा रहा है।
वैज्ञानिक तकनीक और मजबूत मूरिंग प्रणाली के माध्यम से इन संरचनाओं को प्रतिकूल मौसम में भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाता है।
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कृत्रिम रीफ : समुद्र के भीतर नया आवास
समुद्री मत्स्य संसाधनों को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से कृत्रिम रीफ स्थापित किए जा रहे हैं।
समय के साथ ये संरचनाएं समुद्री जीवों के लिए नया आवास तैयार करती हैं और ‘अंडरवॉटर फॉरेस्ट’ जैसी परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं।
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सीवीड यानी समुद्री शैवाल की खेती
समुद्री शैवाल की बढ़ती उपयोगिता के कारण इसकी खेती भी नई आजीविका के रूप में सामने आ रही है।
अंडमान-निकोबार में स्थानीय लोगों को सीवीड उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
खाद्य, औषधीय और औद्योगिक क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता भविष्य में इसे एक महत्वपूर्ण समुद्री उद्योग बना सकती है।
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समुद्र की गहराई में भारत का नया सपना : समुद्रयान
एनआईओटी द्वारा भारत के डीप ओशन मिशन के अंतर्गत समुद्रयान परियोजना पर भी काम किया जा रहा है।
तीन लोगों को समुद्र की लगभग 6,000 मीटर गहराई तक ले जाने की क्षमता वाले मानवयुक्त यान के माध्यम से समुद्री दुनिया को और बेहतर ढंग से समझने का प्रयास किया जा रहा है।
समुद्र की सतह पर खड़े होकर उसके नीचे छिपी विशाल दुनिया के बारे में सोचते हुए यह महसूस हुआ कि पृथ्वी के महासागर आज भी मानव के लिए एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक रहस्य हैं।
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अंडमान की जैव-विविधता : प्रकृति का जीवंत संग्रहालय
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के अधिकारियों से बातचीत के दौरान अंडमान-निकोबार की जैव-विविधता की विशालता को समझने का अवसर मिला।
द्वीपसमूह में हजारों प्राणी प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें कई ऐसी हैं जो दुनिया में केवल इसी क्षेत्र में मिलती हैं।
यहां—
– विविध पक्षी प्रजातियां,
– तितलियां,
– समुद्री जीव,
– कोरल रीफ,
– समुद्री कछुए,
– नारियल केकड़े
प्रकृति की समृद्ध विविधता का हिस्सा हैं।
विशेष रूप से लेदरबैक कछुआ और नारियल केकड़ा जैसे जीव इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान हैं।
यहां आकर यह समझ में आता है कि अंडमान-निकोबार केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि विश्व की महत्वपूर्ण जैव-विविधता धरोहर भी है।
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लॉन्ग आइलैंड और द्वीपों का अलग जीवन
यात्रा के दौरान लॉन्ग आइलैंड की ओर जाने का अवसर भी मिला।
यहां पहुंचने के लिए फेरी और समुद्री यात्रा द्वीपीय जीवन की वास्तविकता से परिचित कराती है।
रंगत, जेट्टी, समुद्री रास्ते और छोटे-छोटे बसे हुए द्वीप—हर स्थान की अपनी अलग कहानी है।
कई स्थानों पर मछुआरे समुदायों का जीवन समुद्र पर निर्भर है। कुछ बस्तियों में मुख्यभूमि भारत से वर्षों पहले आकर बसे परिवार अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ आज भी यहां रह रहे हैं।
बदलता अंडमान : कालापानी से विकास की नई पहचान तक
इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा अनुभव यही रहा कि अंडमान-निकोबार अब केवल ‘कालापानी’ की पहचान तक सीमित नहीं है।
आज यहां—
– आधुनिक सड़कें,
– विशाल पुल,
– डिजिटल फाइबर नेटवर्क,
– आधुनिक हवाई अड्डा,
– वैज्ञानिक कृषि,
– समुद्री अनुसंधान,
– आपदा प्रबंधन,
– ईको-टूरिज्म
की नई तस्वीर दिखाई देती है।
विकास के साथ-साथ यहां प्रकृति संरक्षण की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है।
एक ओर समुद्र पर पुल बन रहे हैं, दूसरी ओर मैंग्रोव और कोरल रीफ को बचाने की चिंता है। एक ओर पर्यटन बढ़ रहा है, दूसरी ओर संवेदनशील जनजातीय और प्राकृतिक क्षेत्रों की सुरक्षा भी आवश्यक है।
यही संतुलन अंडमान-निकोबार के भविष्य को तय करेगा।
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वापसी के समय मन में रह गईं अनगिनत तस्वीरें
आठ दिनों की यह यात्रा समाप्त होने के बाद जब वापसी का समय आया तो मन में अनगिनत दृश्य थे।
सेल्युलर जेल की कालकोठरियां…
नीले समुद्र के बीच फैले द्वीप…
घने जंगलों से गुजरती सड़कें…
बारातांग की प्राचीन गुफाएं…
समुद्र के ऊपर बना विशाल पुल…
समुद्र के नीचे दौड़ती इंटरनेट की केबल…
एनडीआरएफ के जवानों की तैयारी…
नौसेना के युद्धपोत…
वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं…
और समुद्र के साथ जीवन जीते हजारों लोग।
अंडमान-निकोबार की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक पत्रकार के रूप में किया गया भ्रमण नहीं थी। यह भारत के एक ऐसे हिस्से को समझने का अवसर था, जो भौगोलिक रूप से मुख्यभूमि से दूर जरूर है, लेकिन विकास, सुरक्षा, विज्ञान और राष्ट्रीय एकता के मामले में भारत के भविष्य से मजबूती से जुड़ा हुआ है।
कभी ‘कालापानी’ के नाम से भय और पीड़ा की पहचान रखने वाला अंडमान-निकोबार आज उम्मीदों, संभावनाओं और विकास की नई कहानी लिख रहा है।
समुद्र की लहरें आज भी वैसी ही हैं, जंगल आज भी उतने ही घने हैं और द्वीप आज भी समुद्र के बीच खड़े हैं, लेकिन बदल चुका है समय।
अब इन द्वीपों तक केवल जहाज और फेरी ही नहीं पहुंचते—यहां आधुनिक भारत की सड़कें, पुल, इंटरनेट, विज्ञान, पर्यटन और विकास की नई ऊर्जा भी पहुंच चुकी है।
और शायद यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी याद है—
अंडमान-निकोबार को केवल देखना नहीं, बल्कि उसे बदलते हुए महसूस करना।
